मेरा रचना धर्म
इंदौर लिटरेचर फेस्ट में आयोजित“मेरा रचना धर्म”सत्र में तीन विशिष्ट हस्तियों; डॉ. अजय भूषण शुक्ला, मुकेश जी नेमा और उर्मिला शिरीष, का स्वागत किया गया, जिन्होंने अपनी कविताओं, अनुभवों और संवेदनाओं से इस सत्र को बेहद सफल और यादगार बना दिया। कहीं सीख थी, कहीं भावुकता, कहीं व्यंग्य की चुटीली झलक और कहीं जीवन के गहरे अनुभव—इन सभी रंगों ने मिलकर पूरी दर्शक-दीर्घा को शुरू से अंत तक बाँधे रखा।
डॉ. अजय भूषण शुक्ला प्रशासनिक सेवा से जुड़े हैं और उनका मानना है कि पद और परिस्थिति इंसान को बहुत जल्दी संवेदनशील बनाना सिखाते हैं। रोज़ जिन परिस्थितियों का वे सामना करते हैं, वे अनुभव उनके लिए एक ऐसी यात्रा बन जाते हैं, जिसे आम तौर पर लोग नहीं देख पाते। यही विविधता उन्हें भीतर तक प्रभावित करती है और लिखने के लिए प्रेरित करती है, क्योंकि हर अनुभव उन्हें सोचने, समझने और किसी स्थिति का नतीजा निकालने के लिए मजबूर करता है। उनका कहना है कि यह निर्णय क्षमता ही कल्पनाशीलता को जन्म देती है और वही आवाज बनकर कविताओं में ढल जाती है। इसी भावनात्मक प्रवाह को व्यक्त करते हुए उन्होंने अपनी‘मां’पर आधारित कविता भी प्रस्तुत की, जिसने माहौल को गहराई से छू लिया।
दूसरी ओर व्यंग्यकार मुकेश जी नेमा, जो रोज़मर्रा के जीवन में समाज की संवेदनाओं में छिपे सवालों को ढूँढकर उन्हें अपनी रचनाओं में पिरोते हैं औरव्यंग्य के माध्यम से इन सवालो को लोगों के सामने रखते हैंक्योकि एक व्यंग्यकार होने के नाते समाज पर कटाक्ष करना उनकी ज़िम्मेदारी है।लेकिनघर में पोती ईरा के आने के बाद उनके लेखन में एक नया कोमल बदलाव आया। एक व्यंग्यकार होने के बावजूद उनकी कलम अब बाल कविताओं की ओर मुड़ रही है, जिसकी शुरुआत उनकी पुस्तक“उत्तू सी ईरा”से हो गई है। बचपन से ही किताबों के बीच पले-बढ़े और खुद को“किताबी कीड़ा”कहने वाले मुकेश नेमा जी अपने लेखक बनने का श्रेय किताबों को देते हैं, उनकामानना है कि जिसे पढने का शौक होता है साहित्य से प्रेम अक्सर उसे लिखना भी सीखा ही देता हैऔर अब बाल साहित्य लिखने का पूरा श्रेय अपनी पोती ईरा को देते है। वे मुस्कुराकर कहते हैं—“प्यार तो अपने बच्चों से भी बहुत होता है, लेकिन दादा बनने के बाद समझ आता है कि मूल से ब्याज ज्यादा प्यारा होता है।”
इसी सत्र में उर्मिला शिरीष ने भी अपनी उपस्थिति और विचारों से सबका मन जीता। संवेदना और सृजन की सहयात्री उर्मिला जी हिंदी साहित्य की विविध विधाओं में अपनी गहरी छाप छोड़ चुकी हैं। पीएचडी और एमफिल की उपाधिधारिणी होने के साथ-साथ उन्होंने कई शोधार्थियों का मार्गदर्शन किया है और शिक्षा जगत में वर्षों तक महत्वपूर्ण पदों पर सेवा दी है। अब वे पूर्णतः स्वतंत्र लेखन में संलग्न हैं। उनका लेखन स्नेह, समाज और स्त्री-अस्तित्व की गहराइयों को स्पर्श करता है और उनके कहानी संग्रह, कविता-संकलन तथा समीक्षात्मक लेख साहित्य की संवेदनशील परंपरा को नई दृष्टि देते हैं। उन्होंने बताया कि लिखने की शुरुआत उन्होंने 9वीं कक्षा में ही कर दी थी और तब से शब्दों की यात्रा निरंतर चल रही है।
वे बताती हैं कि उनकी लेखन-प्रेरणा समाज ही है, देश का हर वर्ग, हर व्यक्ति, किसान, युवा, वृद्ध, सबकी अपनी कहानी है, और यही कहानिया उन्हें शब्दों में लय देकर कविता का रूप लेने के लिए प्रेरित करते हैं। उनका मानना है कि साहित्य प्रेम से जन्मता है, पाठक को आंदोलित करता है और फिर मनुष्य सो नहीं पाता—क्योंकि साहित्य सवाल जगाता है।
वे लिखने के लिए कोई विशेष तकनीक नहीं अपनातीं, वो कहती है कि पात्र स्वयं आकर दस्तक देते हैं, बात करते हैं, तब कहानी बनती है। उनका माननाहै कि कहानी को कोई ज़बरदस्ती नहीं लिख सकता, क्योकिकहानियाँ हमें चुनती हैं, हम कहानियों को नहीं। एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में वे अपने लेखन में हमेशा मानवीय संवेदना को जीवित रखना चाहती हैं। उनके शब्द केवल मनोरंजन न करें, बल्कि पात्र इतने सशक्त हों कि पाठक के भीतर दर्द, सोच और समाज की पीड़ाओं को समझने की ताकत पैदा करें और उसे उन पहलुओं पर विचार करने के लिए बाध्य करें जिन्हें अक्सर लोग अनदेखा कर देते हैं यही उनका लक्ष्य है।
इन तीनों रचनाकारों को सुनकर श्रोताओं को यह गहराई से महसूस हुआ कि साहित्य केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, वह समाज की आवाज़ भी है। वह गलत को गलत कहने का साहस रखता है, अनसुने प्रश्नों को सामने लाता है और लोगों को उन विषयों पर सोचने के लिए प्रेरित करता है जिन्हें वे सामान्यतः नज़रअंदाज़ कर देते हैं। यह सत्र इस बात का भी प्रमाण था कि साहित्य जितना विविध है, उतना ही एकसूत्र में बँधा हुआ भी है। अलग-अलग दृष्टिकोण, अलग-अलग अनुभव, भिन्न शैलियाँ और अपनी-अपनी विधाओं में लिखने वाले लेखक—फिर भी सबके भीतर एक समान प्रेम है,साहित्य के प्रति समर्पण, संवेदनशीलता और सृजन की जीवित लौहै।