India's Most Vibrant Literature Festival • 14th, 15th, 16th November 2025

लय बदलती कविता


लय बदलती कविता

लय बदलती कविता

लय बदलती कविता के सत्र में इंदौर लिटरेचर फ़ेस्ट ने अपने मंच पर कवि रामायण धर द्विवेदी का हार्दिक स्वागत किया। इस सत्र की गरिमा को और बढ़ाया विशिष्ट अतिथि आशुतोष अग्निहोत्री की उपस्थिति ने, जो न केवल प्रशासनिक सेवा की ऊँचाइयों पर पहुँचे एक प्रखर अधिकारी हैं, बल्कि साहित्य और रचनात्मक अभिव्यक्ति के प्रति गहरी संवेदना रखने वाले सृजनशील व्यक्तित्व भी हैं। 1999 बैच के भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) अधिकारी के रूप में उन्होंने अखिल भारतीय रैंक 26 प्राप्त की थी और वर्तमान में भारतीय खाद्य निगम (FCI) के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक (CMD) के रूप में अतिरिक्त सचिव पदमान पर कार्यरत हैं। उनकी बहुआयामी लेखनी में सौंदर्य, संवेदना और गहराई का संगम दिखाई देता है, जो उन्हें इस सत्र का एक विशिष्ट और प्रेरणादायक हिस्सा बनाता है।

कवि रामायण धर द्विवेदी ने अपने कार्यक्षेत्र की शुरुआत एक अभियंता के रूप में की थी। सिविल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा करने के बावजूद साहित्य के प्रति उनका प्रेम उन्हें वहीं ले आया, जहाँ उनकी आत्मा का निवास था। आज वे एक प्रतिष्ठित हिंदी कवि, गीतकार और प्रेरक वक्ता के रूप में पहचाने जाते हैं। उनकी कविताओं में भावनात्मक और सांस्कृतिक संवेदना सहजता से प्रवाहित होती है। उनकी भाषा में न आधुनिकता की चमक है और न पुरातनता की जटिलता—वे आम जनमानस की सरल, सीधी और हृदय-स्पर्शी आवाज़ हैं। देश के प्रमुख मंचों से लेकर राज्यसभा तक, उनकी वाणी में हिंदी की आत्मा गूंजती है। डॉ. कुमार विश्वास द्वारा प्रदान किया गया युवा गीतकार सम्मान तथा अन्य कई पुरस्कार उनकी साहित्यिक यात्रा के प्रमुख पड़ाव हैं।

वर्डस्वर्थ से प्रेरित रामायण धर द्विवेदी कहते हैं कि उन्हें अपने अंदर के मनुष्य को जीवित रखना है, इसलिए वे साहित्य की ओर लौटते हैं। वह स्वयं को कवि नहीं, बल्कि जीवन-यात्रा का एक साधारण यात्री मानते हैं। उनके शब्द उनके अस्तित्व का प्रमाण हैं और उनकी कविताएँ उनके अनुभवों का सार लेकर समाज तक पहुँचती हैं। बचपन से ही पिता ने उन्हें हिंदी और जीवन-संस्कारों की सीख दी। उन्होंने देखा, सीखा और उन अनुभवों को शब्दों में पिरोकर समाज के सामने रखा।

आशुतोष अग्निहोत्री बताते हैं कि साहित्य से उनका पहला परिचय उनके पिता के माध्यम से हुआ। पिता उन्हें बचपन से यह अभ्यास कराते थे कि जहाँ भी जाओ, वहाँ का अनुभव घर आकर दो भाषाओं में लिखो। इसी निरंतर अभ्यास ने उनकी भाषा को सुदृढ़ किया, चिंतन को गहराई दी और लेखन के प्रति स्वाभाविक लगाव जगाया। वे अपनी समग्र साहित्यिक यात्रा का श्रेय निसंकोच अपने पिता को देते हैं।

उनका मानना है कि कविता परीक्षा और परिश्रम दोनों चाहती है। यदि कोई कवि यह सोचकर लिखे कि कितने लोग पढ़ेंगे या कितनी प्रसिद्धि मिलेगी, तो उसकी रचना सच्चे अर्थों में सफल नहीं हो सकती। कविता का उद्देश्य मनुष्य को भीतर से उठाना, उजाला देना और भ्रम दूर करना है। एक सार्थक शब्द युगों तक प्रेरणा दे सकता है, इसलिए रचनाकार के शब्दों में सकारात्मकता और प्रभाव होना आवश्यक है। जब कवि स्वयं से ऊपर उठकर रचना करता है, तभी कविता सच्ची और सार्थक बनती है।

अपनी शुरुआती कविताओं में से रामायण “मैं दीप बनूँ, मैं गीत बनूँ” को आज भी अपनी प्रिय रचना मानते हैं। यह कविता उनकी उस मूल संवेदनशीलता और सरल भावभूमि का प्रतीक है, जिसने उनके पूरे लेखन को एक विशिष्ट पहचान दी है।

सत्र का सुंदर समापन कवि आशुतोष अग्निहोत्री द्वारा शिव पर आधारित अपनी लोकप्रिय कविता के भावपूर्ण पाठ से हुआ। उनकी वाणी में भरी आत्मीयता और श्रद्धा ने पूरे सभागार को अद्भुत शांति और ऊर्जा से भर दिया। इनदोनों कवि के शब्द यह सिद्ध करते हैं कि भाव जब ईमानदारी से बोले जाएँ, तो वे केवल सुने नहीं जाते—वे मन में बस जाते हैं।