मार्केटिंग मिक्सोलॉजी
इंदौर लिटरेचर फेस्टिवल के ‘मार्केटिंग मिक्सोलॉजी’ सत्र में प्रतिष्ठित ब्रांड कोच, स्ट्रैटेजिस्ट, लेखक और एफसीबी उल्का के पूर्व सीईओ एवं एग्ज़ीक्यूटिव डायरेक्टर अम्बी परमेस्वरन ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। 35 से अधिक वर्षों के अनुभव के साथ उन्होंने कंज़्यूमर, टेक, हेल्थकेयर और मीडिया जैसी विभिन्न श्रेणियों में भारत के कई आइकॉनिक ब्रांड्स के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
आईआईटी मद्रास और आईआईएम कलकत्ता के पूर्व छात्र रहे परमेस्वरन, एडवर्टाइजिंग क्लब बॉम्बे और एडवर्टाइजिंग एजेंसीज़ एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया के अध्यक्ष के रूप में भी अपनी विशेषज्ञता का लोहा मनवा चुके हैं। वे आईआईएम कलकत्ता के बोर्ड ऑफ़ गवर्नर्स में भी सक्रिय भूमिका निभा चुके हैं। अपनी ब्रांड एडवाइज़री फर्म स्थापित करने के बाद वे एडजंक्ट फ़ैकल्टी के रूप में प्रैक्टिस-आधारित फ्रेमवर्क्स भी सिखाते हैं।
सत्र की शुरुआत अम्बी परमेस्वरन ने आयोजन को उसके ग्यारहवें संस्करण के लिए हार्दिक शुभकामनाएँ देकर की। उन्होंने कहा कि इतने बड़े स्तर पर ऐसा कार्यक्रम आयोजित करना वास्तव में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। लोगों को जोड़ना, प्रायोजकों से संवाद करना, लेखकों से बात करके उन्हें यहाँ तक लाना अत्यंत चुनौतीपूर्ण कार्य है, जिसे आयोजन टीम ने सफलतापूर्वक पूरा किया है।
अम्बी परमेस्वरन ने कहा कि आज के समय में किसी भी ब्रांड की पहचान गढ़ना एक अत्यंत महत्वपूर्ण और सूक्ष्म कार्य है। उन्होंने अपनी नई पुस्तक के विषयों का उल्लेख करते हुए बताया कि इसमेंकम्युनिकेशन, ब्रांड नेगोसिएशनऔरकंज्यूमर बिहेवियरकी प्रक्रियाओं पर उनके विचार शामिल हैं।
सत्र के दौरान उनसे पूछा गया कि लेखन में चैटजीपीटी या एआई का उपयोग करना उचित है या नहीं। इस पर उन्होंने बताया कि जब वे अपनी पुस्तक का नाम तय करने में उलझन में थे, तब उन्होंने भी सोचा कि थोड़ा चैटजीपीटी का सहारा लें। उन्होंने अपने विचार वहाँ रखे और numerous प्रयासों के बाद उन्हें “द मार्किटिंग मिक्सचर” जैसा शीर्षक पसंद आया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि पुस्तकें इसी प्रकार लिखी जानी चाहिए—उनकी विषयवस्तु पूरी तरह लेखक की अपनी होनी चाहिए। उन्होंने केवल नाम खोजने के लिए चैटजीपीटी का सहारा लिया था, पूरी पुस्तक चैटजीपीटी पर निर्भर होकर नहीं लिखी। उनका कहना था कि चैटजीपीटी द्वारा दिया गया लेखन अक्सर सामान्य होता है, जबकि एक लेखक अपने अनुभवों को जोड़कर लेखन को विशिष्ट बनाता है। लेखक जो लिखता है, वह उसके जीवन, अनुभवों और भावनाओं से जुड़ा होता हैऔर यह गहराई किसी भी तकनीकी साधन से प्राप्त नहीं की जा सकती।
बात आगे बढ़ी तो उनसे पूछा गया कि मार्केटिंग में क्या नहीं करना चाहिए। उन्होंने कहा कि उनके विचार में किसी भी संस्था को “क्षणिक अवसर आधारित प्रचार” या“मोमेंटमार्केटिंग” नहीं करना चाहिए। कई बार देखा जाता है कि जैसे ही कोई विषय चर्चा में आता है, कुछ संस्थाएँ बिना शोध किए, बिना उसके परिणामों को समझे, तुरंत प्रचार सामग्री तैयार कर देती हैं, और बाद में उन्हें उसका नकारात्मक असर झेलना पड़ता है। उन्होंने हाल ही की एक घटना का उदाहरण दिया, जिसमें एक संस्था ने एक युवती के चेहरे के बालों पर मज़ाक करते हुए विज्ञापन बनाया था, जो अत्यंत असंवेदनशील था। उन्होंने कहा कि ऐसा इसलिए भी होता है क्योंकि बड़ी कंपनियों में महत्वपूर्ण निर्णय लेने वाले कई पदों पर बहुत युवा लोग बैठे होते हैं, जिनके पास अनुभव कम होता है और वे बिना पर्याप्त मार्गदर्शन के निर्णय ले लेते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि कुछ संस्थाएँ समयानुकूल संदेश बहुत संतुलित ढंग से प्रस्तुत करती हैं, परंतु हर संस्था यह संतुलन नहीं बना पाती। इसलिए ऐसी कोशिशें जोखिमपूर्ण भी हो सकती हैं।
बातचीत आगे नए दौर की संस्थाओं और पुराने स्थापित ब्रांडों तक पहुँची। नए युग की संस्थाएँ आकर्षक और आधुनिक होती हैं, वे जानते हैं कि आज की युवा पीढ़ी क्या चाहती है और वे लगातार नए प्रयोग करती रहती हैं। ऐसे में यह प्रश्न उठा कि पुराने, स्थापित अर्थात उत्तराधिकार में आगे बढ़ रहे ब्रांड बाज़ार में अपनी जगह कैसे बनाए रखें। इस पर अम्बी परमेस्वरन ने कहा कि जो ब्रांड आज बड़े नाम बन चुके हैं, वे भी कभी बिल्कुल छोटे स्तर से शुरू हुए थे। उन्होंने उदाहरण दिया कि एक प्रसिद्ध आभूषण संस्था तनिष्क, जो आज अत्यंत बड़ा नाम है, एक समय बंद होने की कगार पर थी। तब अंतिम प्रयास के रूप में उन्होंने दस दुकानों में सोने की शुद्धता जाँचने वाली मशीनें लगवाईं और एक संदेश चलाया कि “चोर आपके घर में भी हो सकते हैं, इसलिए अपने सोने की जाँच अवश्य करवाएँ।” यह प्रयास बहुत सफल हुआ और इसी अभियान के कारण वह संस्था बंद होने से बच गई।
उन्होंने कहा कि चाहे ब्रांड नया हो या पुराना, उसे हमेशा यह समझना चाहिए कि उसके ग्राहकों को क्या चाहिए। पुराने ब्रांड को भी समय के साथ स्वयं में परिवर्तन लाते रहना चाहिए। उन्होंने बताया कि मिन्त्रा, जो आजएक प्रसिद्ध ऑनलाइन वस्त्र मंच है, आज से पच्चीस वर्ष पहले वस्त्र संस्था नहीं था, वह कंपनियों के लिए टोपी और टीशर्ट बनाता था। लेकिन समय के साथ उसने अपनी क्षमता पहचानी और स्वयं को बदलकर आज के रूप में स्थापित किया। इसलिए संस्थाओं को निरंतर प्रयोग करते रहना चाहिए, कोशिश करने के लिए तत्पर रहना चाहिए, लेकिन असफल होने के लिए भी तैयार रहना चाहिए।
आगे मार्केटिंग से जुड़े मिथकों की बात करते हुए वे कहते हैं कि कुछ लोगों और कंपनियों को लगता है कि हर विज्ञापन चमकदार और अत्यधिक रचनात्मक होना चाहिए, लेकिन विज्ञापन का उद्देश्य बिक्री लाना होता है और उन्हें उसी पर ध्यान देना चाहिए। उदाहरण के लिए सन्तूर, जिसने छोटी शुरुआत की थी, लेकिन आज वह लक्स से बड़ा ब्राण्ड है, जबकि उसके विज्ञापन हमेशा साधारण रहे हैं, फिर भी वे काम करते हैं।
आगे उनसे पूछा गया कि क्या कोई ऐसा विज्ञापन है जिसके लिए वे सोचते हैं कि काश उन्हें उसमें काम करने का अवसर मिलता। इस पर वे कहते हैं कि ड्रीम 11 की नई विज्ञापन श्रंखला, जिसमें क्रिकेट टीम के साथ आमिर ख़ान, रणबीर कपूर जैसे फिल्म जगत के प्रसिद्ध कलाकार भी हैं, उन्हें बहुत पसंद आई और वे वास्तव में उसमें काम करना चाहते थे।
अंत में एक अच्छे बाज़ारकर्ता की विशेषता बताते हुए अम्बी परमेस्वरन ने कहा कि हमेशा सीखते रहो, यही गुण सबसे ज़रूरी है और सबसे अच्छा भी।